मज़ा देखा किसी को ऐ परी-रू मुँह लगाने का
अब आईना भी कहता है कि मैं मद्द-ए-मुक़ाबिल हूँ
सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी
लटकते देखा सीने पर जो तेरे तार-ए-गेसू को
उसे दीवाने वहशत में तिरा बंद-ए-क़बा समझे
सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी
किस से दूँ तश्बीह मैं ज़ुल्फ़-ए-मुसलसल को तिरी
फ़िक्र है कोताह और मज़मूँ बहुत है दूर का
सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी
खोला दरवाज़ा समझ कर मुझ को ग़ैर
खा गए धोका मिरी आवाज़ से
सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी
ख़याल-ए-नाफ़ में ज़ुल्फ़ों ने मुश्कीं बाँध दीं मेरी
शनावर किस तरह गिर्दाब से बे-दस्त-ओ-पा निकले
सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी
काली घटा कब आएगी फ़स्ल-ए-बहार में
आँखें सफ़ेद हो गईं इस इंतिज़ार में
सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी
आगे मेरे न तीखी मार ऐ शैख़
रात का माजरा सुना दूँगा
सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी
जो मुँह से कहते हैं कुछ और करते हैं कुछ और
वही ज़माना में कुछ इख़्तियार रखते हैं
सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी
जब बोसा ले के मुद्दआ' मैं ने बयाँ किया
बोले ज़ियादा पाँव पसारा न कीजिए
सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी

