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सलमान अख़्तर शायरी | शाही शायरी

सलमान अख़्तर शेर

27 शेर

निकले थे दोनों भेस बदल के तो क्या अजब
मैं ढूँडता ख़ुदा को फिरा और ख़ुदा मुझे

सलमान अख़्तर




ख़ाली बरामदों ने मुझे देख कर कहा
क्या बात है उदास से कुछ लग रहे हो तुम

सलमान अख़्तर




कोई शय एक सी नहीं रहती
उम्र ढलती है ग़म बदलते हैं

सलमान अख़्तर




कुछ तो अपने लिए भी रखना है
ज़ख़्म औरों को क्यूँ दिखाएँ सब

सलमान अख़्तर




कुछ तो मैं भी डरा डरा सा था
और कुछ रास्ता नया सा था

सलमान अख़्तर




क्या नहीं जानता मुझे कोई
क्या नहीं शहर में वो घर बाक़ी

सलमान अख़्तर




मुझे ख़बर न थी इस घर में कितने कमरे हैं
मैं कैसे ले के वहाँ सारी दास्ताँ जाता

सलमान अख़्तर




ज़िंदगी हम से तो इस दर्जा तग़ाफ़ुल न बरत
हम भी शामिल थे तिरे चाहने वालों में कभी

सलमान अख़्तर




ये तमन्ना है कि अब और तमन्ना न करें
शेर कहते रहें चुप चाप तक़ाज़ा न करें

सलमान अख़्तर