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सलाम संदेलवी शायरी | शाही शायरी

सलाम संदेलवी शेर

21 शेर

सौ बार आई होंटों पे झूटी हँसी मगर
इक बार भी न दिल से कभी मुस्कुरा सके

सलाम संदेलवी




ख़ुशी के फूल खिले थे तुम्हारे साथ कभी
फिर इस के ब'अद न आया बहार का मौसम

सलाम संदेलवी




क्या इसी को बहार कहते हैं
लाला-ओ-गुल से ख़ूँ टपकता है

सलाम संदेलवी




मता-ए-ग़म मिरे अश्कों ही तक नहीं महदूद
इन्हीं में टूटे सितारों को भी शुमार करो

सलाम संदेलवी




मुझ को तो ख़ून-ए-दिल ही पीना है
दस्त-ए-साक़ी में गर है जाम तो क्या

सलाम संदेलवी




रह-ए-हयात चमक उठ्ठे कहकशाँ की तरह
अगर चराग़-ए-मोहब्बत कोई जला के चले

सलाम संदेलवी




तीरा-ओ-तार फ़ज़ाओं में जिया हूँ अब तक
निकहत-ओ-नूर के अय्याम की हसरत ही रही

सलाम संदेलवी




यूँ बाग़बाँ ने मोहर लगा दी ज़बान पर
रूदाद-ए-ग़म नसीब के मारे न कह सके

सलाम संदेलवी




ये तो मालूम है उन तक न सदा पहुँचेगी
जाने क्या सोच के आवाज़ दिए जाता हूँ

सलाम संदेलवी