सलीक़ा जिन को होता है ग़म-ए-दौराँ में जीने का
वो यूँ शीशे को हर पत्थर से टकराया नहीं करते
नुशूर वाहिदी
किस बेबसी के साथ बसर कर रहा है उम्र
इंसान मुश्त-ए-ख़ाक का एहसास लिए हुए
नुशूर वाहिदी
मआज़-अल्लाह मय-ख़ाने के औराद-ए-सहर-गाही
अज़ाँ में कह गया मैं एक दिन या पीर-ए-मय-ख़ाना
नुशूर वाहिदी
मैं अभी से किस तरह उन को बेवफ़ा कहूँ
मंज़िलों की बात है रास्ते में क्या कहूँ
नुशूर वाहिदी
मैं तिनकों का दामन पकड़ता नहीं हूँ
मोहब्बत में डूबा तो कैसा सहारा
नुशूर वाहिदी
मेरी आँखों में हैं आँसू तेरे दामन में बहार
गुल बना सकता है तू शबनम बना सकता हूँ मैं
नुशूर वाहिदी
'नुशूर' आलूदा-ए-इस्याँ सही पर कौन बाक़ी है
ये बातें राज़ की हैं क़िब्ला-ए-आलम भी पीते हैं
नुशूर वाहिदी
क़दम मय-ख़ाना में रखना भी कार-ए-पुख़्ता-काराँ है
जो पैमाना उठाते हैं वो थर्राया नहीं करते
नुशूर वाहिदी
ज़िंदगी परछाइयाँ अपनी लिए
आइनों के दरमियाँ से आई है
नुशूर वाहिदी

