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निसार इटावी शायरी | शाही शायरी

निसार इटावी शेर

26 शेर

सुन ऐ कोह-ओ-दमन को सब्ज़ ख़िलअत बख़्शने वाले
नहीं मिलता तिरे दर से ग़रीबों को कफ़न अब तक

निसार इटावी




मौसम-ए-गुल है बादल छाए खनक रहे हैं पैमाने
कैसी तौबा, तौबा तौबा, तौबा नज़्र-ए-जाम करो

निसार इटावी




नाहीद ओ क़मर ने रातों के अहवाल को रौशन कर तो दिया
वो दीप किसी से जल न सके जो दिल में उजाला करते हैं

निसार इटावी




निगाहों से ना-आश्ना चंद जल्वे
पस-ए-लाला-ओ-यासमन और भी हैं

निसार इटावी




क़फ़स भी है यहाँ सय्याद भी गुलचीं भी काँटे भी
चमन को हम समझते हैं मगर अपना चमन अब तक

निसार इटावी




शौक़ कितने फ़रेब देता है
मुस्कुरा कर हमारा नाम न ले

निसार इटावी




सुब्ह बिछड़ कर शाम का व'अदा शाम का होना सहल नहीं
उन की तमन्ना फिर कर लेना सुब्ह को पहले शाम करो

निसार इटावी




यक़ीनन रहबर-ए-मंज़िल कहीं पर रास्ता भूला
वगर्ना क़ाफ़िले के क़ाफ़िले गुम हो नहीं सकते

निसार इटावी




ये दिल वालों से पूछो इस को दिल वाले समझते हैं
बिगाड़ आई हवा ज़ुल्फ़ें किसी की या सँवार आई

निसार इटावी