EN اردو
नज़्म तबा-तबाई शायरी | शाही शायरी

नज़्म तबा-तबाई शेर

19 शेर

मिरी बातों में क्या मालूम कब सोए वो कब जागे
सिरे से इस लिए कहनी पड़ी फिर दास्ताँ मुझ को

नज़्म तबा-तबाई




यूँ मैं सीधा गया वहशत में बयाबाँ की तरफ़
हाथ जिस तरह से आता है गरेबाँ की तरफ़

नज़्म तबा-तबाई




ये दिल की बे-क़रारी ख़ाक हो कर भी न जाएगी
सुनाती है लब-ए-साहिल से ये रेग-ए-रवाँ मुझ को

नज़्म तबा-तबाई




उड़ाई ख़ाक जिस सहरा में तेरे वास्ते मैं ने
थका-माँदा मिला इन मंज़िलों में आसमाँ मुझ को

नज़्म तबा-तबाई




उड़ के जाती है मिरी ख़ाक इधर गाह उधर
कुछ पता दे न गई उम्र-ए-गुरेज़ाँ अपना

नज़्म तबा-तबाई




तू ने तो अपने दर से मुझ को उठा दिया है
परछाईं फिर रही है मेरी उसी गली में

नज़्म तबा-तबाई




सहर को उठते हैं वो देख कर कफ़-ए-रंगीं
अब आइने पे भी सिक्के हिना के बैठ गए

नज़्म तबा-तबाई




रोज़-ए-सियह में साथ कोई दे तो जानिए
जब तक फ़रोग़-ए-शम्अ है परवाना साथ है

नज़्म तबा-तबाई




नज़र कहीं नहीं अब आते हज़रत-ए-नासेह
सुना है घर में किसी मह-लक़ा के बैठ गए

नज़्म तबा-तबाई