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नफ़स अम्बालवी शायरी | शाही शायरी

नफ़स अम्बालवी शेर

23 शेर

उसे गुमाँ है कि मेरी उड़ान कुछ कम है
मुझे यक़ीं है कि ये आसमान कुछ कम है

नफ़स अम्बालवी




मिरे ख़याल की पर्वाज़ बस तुम्हीं तक थी
फिर इस के बा'द मुझे कोई आसमाँ न मिला

नफ़स अम्बालवी




निगाहों के मनाज़िर बे-सबब धुंधले नहीं पड़ते
हमारी आँख में दरिया कोई ठहरा हुआ होगा

नफ़स अम्बालवी




सारी गवाहियाँ तो मिरे हक़ में आ गईं
लेकिन मिरा बयान ही मेरे ख़िलाफ़ था

नफ़स अम्बालवी




तारीकियाँ क़ुबूल थीं मुझ को तमाम उम्र
लेकिन मैं जुगनुओं की ख़ुशामद न कर सका

नफ़स अम्बालवी




तू दरिया है तो होगा हाँ मगर इतना समझ लेना
तिरे जैसे कई दरिया मिरी आँखों में रहते हैं

नफ़स अम्बालवी




ये इश्क़ के ख़ुतूत भी कितने अजीब हैं
आँखें वो पढ़ रही हैं जो तहरीर भी नहीं

नफ़स अम्बालवी




ज़िंदगी वक़्त के सफ़्हों में निहाँ है साहब
ये ग़ज़ल सिर्फ़ किताबों में नहीं मिलती है

नफ़स अम्बालवी




ज़ख़्म अभी तक ताज़ा हैं हर दाग़ सुलगता रहता है
सीने में इक जलियाँ-वाला-बाग़ सुलगता रहता है

नफ़स अम्बालवी