मैं कहूँ आप तुम्हें आप कहें तुम मुझ को
तुम जताते नहीं किस रोज़ तहक्कुम मुझ को
किशन कुमार वक़ार
कुछ ग़म फ़िराक़ का है न कुछ वस्ल की ख़ुशी
हूँ उस के ज़ौक़-ओ-शौक़ में मसरूर रात दिन
किशन कुमार वक़ार
किस वास्ते लड़ते हैं बहम शैख़-ओ-बरहमन
का'बा न किसी का है न बुत-ख़ाना किसी का
किशन कुमार वक़ार
जो मुझ पर है वही है ग़ैर पर लुत्फ़
हुआ है ख़ात्मा इस पर वफ़ा का
किशन कुमार वक़ार
जिस को पास उस ने बिठाया एक दिन
उस को दुनिया से उठाया एक दिन
किशन कुमार वक़ार
इमसाक में रहेगी न पाबंदी-ए-मनी
हरगिज़ नहीं हैं मुग़बचे बिंत-उल-इनब से कम
किशन कुमार वक़ार
आरिज़ पे रही ज़ुल्फ़-ए-सियह-फ़ाम हमेशा
पामाल रहा कुफ़्र का इस्लाम हमेशा
किशन कुमार वक़ार
हम बंदगान-ए-इश्क़ का मस्लक निराला है
काफ़िर की इस में वज़्अ न दीं-दार की तरह
किशन कुमार वक़ार
है जब से दस्त-गीर-ए-जुनूँ कू-ए-यार में
फिरता हूँ एक पाँव से परकार की तरह
किशन कुमार वक़ार

