फिर वही सौदा वही वहशत वही तर्ज़-ए-जुनूँ
हैं निशाँ मौजूद सारे इश्क़ की तासीर के
जितेन्द्र मोहन सिन्हा रहबर
खिंचते जाते हैं ख़ुद मिरी जानिब
मुझ को ज्यूँ ज्यूँ वो आज़माते हैं
जितेन्द्र मोहन सिन्हा रहबर
महव-ए-दीदार हुए जाते हैं रह-रौ सारे
इक तमाशा हुआ गोया रुख़-ए-दिलबर न हुआ
जितेन्द्र मोहन सिन्हा रहबर
मोहब्बत में नहीं है इब्तिदा या इंतिहा कोई
हम अपने इश्क़ को ही इश्क़ की मंज़िल समझते हैं
जितेन्द्र मोहन सिन्हा रहबर
मोहब्बत सी शय उस ने मुझ को अता की
कि ख़ुश ख़ुश चलूँ उम्र बर्बाद कर के
जितेन्द्र मोहन सिन्हा रहबर
तंग पैमाई का शिकवा साक़ी-ए-अज़ली से किया
हम ने समझा ही नहीं दस्तूर-ए-मय-ख़ाना अभी
जितेन्द्र मोहन सिन्हा रहबर
ज़माना ये आ गया है 'रहबर' कि अहल-ए-बीनश को कौन पूछे
जमे हैं मक्कार कुर्सियों पर दिखा रहे हैं गंवार आँखें
जितेन्द्र मोहन सिन्हा रहबर
तू ने ही रह न दिखाई तो दिखाएगा कौन
हम तिरी राह में गुमराह हुए बैठे हैं
जितेन्द्र मोहन सिन्हा रहबर
कैसी कशिश है इश्क़ के टूटे मज़ार में
मेला लगा हुआ है हमारे दयार में
जितेन्द्र मोहन सिन्हा रहबर

