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इब्राहीम अश्क शायरी | शाही शायरी

इब्राहीम अश्क शेर

21 शेर

थी हौसले की बात ज़माने में ज़िंदगी
क़दमों का फ़ासला भी यहाँ एक जस्त था

इब्राहीम अश्क




न दिल में कोई ग़म रहे न मेरी आँख नम रहे
हर एक दर्द को मिटा शराब ला शराब दे

इब्राहीम अश्क




नाम को भी न किसी आँख से आँसू निकला
शम्अ महफ़िल में जलाती रही परवाने को

इब्राहीम अश्क




नहीं है तुम में सलीक़ा जो घर बनाने का
तो 'अश्क' जाओ परिंदों के आशियाँ देखो

इब्राहीम अश्क




पत्थर में भी आग है छेड़ो तो जल जाए
जो इस आग में तप गया वो हीरा कहलाए

इब्राहीम अश्क




प्यासी धरती देख के बादल उड़ उड़ जाए
ये दुनिया की रीत है तरसे को तरसाए

इब्राहीम अश्क




ये और बात है कि बरहना थी ज़िंदगी
मौजूद फिर भी मेरे बदन पर लिबास था

इब्राहीम अश्क




ज़िंदगी वादी ओ सहरा का सफ़र है क्यूँ है
इतनी वीरान मिरी राह-गुज़र है क्यूँ है

इब्राहीम अश्क




ज़िंदगी अपनी मुसलसल चाहतों का इक सफ़र
इस सफ़र में बार-हा मिल कर बिछड़ जाता है वो

इब्राहीम अश्क