परतव-ए-हुस्न हूँ इस वास्ते महदूद हूँ मैं
हुस्न हो जाऊँ तो दुनिया में समा भी न सकूँ
हीरा लाल फ़लक देहलवी
मक़ाम-ए-बर्क़ जिसे आसमाँ भी कहते हैं
इरादा अब है वहाँ अपना घर बनाने का
हीरा लाल फ़लक देहलवी
मिरा ख़त पढ़ लिया उस ने मगर ये तो बता क़ासिद
नज़र आई जबीं पर बूँद भी कोई पसीने की
हीरा लाल फ़लक देहलवी
नज़रों में हुस्न दिल में तुम्हारा ख़याल है
इतने क़रीब हो कि तसव्वुर मुहाल है
हीरा लाल फ़लक देहलवी
निय्यत अगर ख़राब हुई है हुज़ूर की
घड़ लो कोई कहानी हमारे क़ुसूर की
हीरा लाल फ़लक देहलवी
पहुँचो गर इक चाँद पर सौ और आते हैं नज़र
आसमाँ जाने है कितनी दूर तक फैला हुआ
हीरा लाल फ़लक देहलवी
तन को मिट्टी नफ़स को हवा ले गई
मौत को क्या मिला मौत क्या ले गई
हीरा लाल फ़लक देहलवी
याद इतना है मिरे लब पे फ़ुग़ाँ आई थी
फिर ख़ुदा जाने कहाँ दिल की ये आवाज़ गई
हीरा लाल फ़लक देहलवी
वुसअ'त तिलिस्म-ख़ाना-ए-आलम की क्या कहूँ
थक थक गई निगाह तमाशे न कम हुए
हीरा लाल फ़लक देहलवी

