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हसरत अज़ीमाबादी शायरी | शाही शायरी

हसरत अज़ीमाबादी शेर

25 शेर

सज्दा-गाह-ए-बरहमन और शैख़ हैं दैर-ओ-हरम
मय-परस्तों के लिए बुनियाद मय-ख़ाने हुए

हसरत अज़ीमाबादी




मत हलाक इतना करो मुझ को मलामत कर कर
नेक-नामो तुम्हें क्या मुझ से है बद-नाम से काम

हसरत अज़ीमाबादी




मोहब्बत एक तरह की निरी समाजत है
मैं छोड़ूँ हूँ तिरी अब जुस्तुजू हुआ सो हुआ

हसरत अज़ीमाबादी




ना-ख़लफ़ बस-कि उठी इश्क़ ओ जुनूँ की औलाद
कोई आबाद-कुन-ए-ख़ाना-ए-ज़ंजीर नहीं

हसरत अज़ीमाबादी




निभे थी आन उन्हों की हमेशा इश्क़ में ख़ूब
तुम्हारे दौर में मेरी गदा हुईं आँखें

हसरत अज़ीमाबादी




रहे है नक़्श मेरे चश्म-ओ-दिल पर यूँ तिरी सूरत
मुसव्विर की नज़र में जिस तरह तस्वीर फिरती है

हसरत अज़ीमाबादी




साक़िया पैहम पिला दे मुझ को माला-माल जाम
आया हूँ याँ मैं अज़ाब-ए-होशयारी खींच कर

हसरत अज़ीमाबादी




उठूँ दहशत से ता महफ़िल से उस की
इताब उस का है हर इक हम-नशीं पर

हसरत अज़ीमाबादी




ज़ुल्फ़-ए-कलमूँही को प्यारे इतना भी सर मत चढ़ा
बे-महाबा मुँह पे तेरे पाँव करती है दराज़

हसरत अज़ीमाबादी