कभी हाथ भी आएगा यार सच कह
या यूँही तू बातें बनाता रहेगा
ग़ुलाम यहया हुज़ूर अज़ीमाबादी
हर कोई अपनी फ़हम-ए-नाक़िस में
पुख़्ता सौदा-ए-ख़ाम रखता है
ग़ुलाम यहया हुज़ूर अज़ीमाबादी
इश्क़ में दर्द से है हुर्मत-ए-दिल
चश्म को आबरू है आँसू से
ग़ुलाम यहया हुज़ूर अज़ीमाबादी
इश्क़ में ख़ूब नीं बहुत रोना
इस से इफ़शा-ए-राज़ होता है
ग़ुलाम यहया हुज़ूर अज़ीमाबादी
इश्क़ ने सामने होते ही जलाया दिल को
जैसे बस्ती को लगावे है अदू जंग में आग
ग़ुलाम यहया हुज़ूर अज़ीमाबादी
जो जी चाहे है देखूँ माह-ए-नौ कहता है दिल मेरा
इधर क्या देखता है अबरू-ए-ख़मदार के बंदे
ग़ुलाम यहया हुज़ूर अज़ीमाबादी
कब इस जी की हालत कोई जानता है
जो जी जानता है सो जी जानता है
ग़ुलाम यहया हुज़ूर अज़ीमाबादी
तुझ बिन इक दल हो पास रहता है
वो भी अक्सर उदास रहता है
ग़ुलाम यहया हुज़ूर अज़ीमाबादी
शब-ए-हिज्र में एक दिन देखना
अगर ज़िंदगी है तो मर जाएँगे
ग़ुलाम यहया हुज़ूर अज़ीमाबादी

