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गोया फ़क़ीर मोहम्मद शायरी | शाही शायरी

गोया फ़क़ीर मोहम्मद शेर

24 शेर

नासेहा आशिक़ी में रख मा'ज़ूर
क्या करूँ आलम-ए-जवानी है

गोया फ़क़ीर मोहम्मद




न मर के भी तिरी सूरत को देखने दूँगा
पड़ूँगा ग़ैर की आँखों में वो ग़ुबार हूँ मैं

गोया फ़क़ीर मोहम्मद




न होगा कोई मुझ सा महव-ए-तसव्वुर
जिसे देखता हूँ समझता हूँ तू है

गोया फ़क़ीर मोहम्मद




आसमाँ कहते हैं जिस को वो ज़मीन-ए-शेर है
माह-ए-नौ मिस्रा है वस्फ़-ए-अबरू-ए-ख़मदार में

गोया फ़क़ीर मोहम्मद




ख़ून मिरा कर के लगाना न हिना मेरे ब'अद
दस्त रंगीं न हों अंगुश्त-नुमा मेरे ब'अद

गोया फ़क़ीर मोहम्मद




जामा-ए-सुर्ख़ तिरा देख के गुल
पैरहन अपना क़बा करते हैं

गोया फ़क़ीर मोहम्मद




इत्र मिट्टी का लगाया चाहिए पोशाक में
ख़ाक से रग़बत रहे मिलना है इक दिन ख़ाक में

गोया फ़क़ीर मोहम्मद




हर गाम पे ही साए से इक मिस्रा-ए-मौज़ूँ
गर चंद क़दम चलिए तो क्या ख़ूब ग़ज़ल हो

गोया फ़क़ीर मोहम्मद




गया है कूचा-ए-काकुल में अब दिल
मुसलमाँ वारिद-ए-हिन्दोस्ताँ है

गोया फ़क़ीर मोहम्मद