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फ़राग़ रोहवी शायरी | शाही शायरी

फ़राग़ रोहवी शेर

20 शेर

सुना है अम्न-परस्तों का वो इलाक़ा है
वहीं शिकार कबूतर हुआ तो कैसे हुआ

फ़राग़ रोहवी




मुझ में है यही ऐब कि औरों की तरह मैं
चेहरे पे कभी दूसरा चेहरा नहीं रखता

फ़राग़ रोहवी




न चाँद ने किया रौशन मुझे न सूरज ने
तो मैं जहाँ में मुनव्वर हुआ तो कैसे हुआ

फ़राग़ रोहवी




न जाने कैसा समुंदर है इश्क़ का जिस में
किसी को देखा नहीं डूब के उभरते हुए

फ़राग़ रोहवी




नफ़रत के संसार में खेलें अब ये खेल
इक इक इंसाँ जोड़ के बन जाएँ हम रेल

फ़राग़ रोहवी




उसी तरफ़ है ज़माना भी आज महव-ए-सफ़र
'फ़राग़' मैं ने जिधर से गुज़रना चाहा था

फ़राग़ रोहवी




ज़रा सी बात पे क्या क्या न खो दिया मैं ने
जो तुम ने खोया है उस का शुमार तुम भी करो

फ़राग़ रोहवी




यारो हुदूद-ए-ग़म से गुज़रने लगा हूँ मैं
मुझ को समेट लो कि बिखरने लगा हूँ मैं

फ़राग़ रोहवी




मिरी मैली हथेली पर तो बचपन से
ग़रीबी का खरा सोना चमकता है

फ़राग़ रोहवी