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बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन शायरी | शाही शायरी

बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन शेर

20 शेर

तमाम लाला ओ गुल के चराग़ रौशन हैं
शजर शजर पे शगूफ़ों में जल रही है हवा

बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन




ख़ुद पे ये ज़ुल्म गवारा नहीं होगा हम से
हम तो शो'लों से न गुज़़रेंगे न सीता समझें

बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन




कितने सादा हैं हम कि बैठे हैं
दाग़-ए-दिल आँसुओं से धोने को

बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन




मेरी तरह टूटे आईने में उस ने भी
टुकड़े टुकड़े अपने आप को पाया होगा

बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन




नहीं है ख़्वाब दीवाने का हस्ती
ये दुनिया सिर्फ़ इक धोका नहीं है

बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन




उठ कर चले गए तो कभी फिर न आएँगे
फिर लाख तुम बुलाओ सदाएँ दिया करो

बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन




ज़रा सी देर भी रुकता तो कुछ पता चलता
वो रंग था कि थी ख़ुशबू सहाब सा क्या था

बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन




यूँ चुप रहा करे से तो हो जाए है जुनूँ
ज़ख़्म-ए-निहाँ कुरेद के कुछ रो लिया करो

बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन




ख़ुद अपनी फ़िक्र उगाती है वहम के काँटे
उलझ उलझ के मिरा हर सवाल ठहरा है

बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन