मुझे दुश्मन से अपने इश्क़ सा है
मैं तन्हा आदमी की दोस्ती हूँ
बाक़र मेहदी
जाने क्यूँ उन से मिलते रहते हैं
ख़ुश वो क्या होंगे जब ख़फ़ा ही नहीं
बाक़र मेहदी
काफ़िरी इश्क़ का शेवा है मगर तेरे लिए
इस नए दौर में हम फिर से मुसलमाँ होंगे
बाक़र मेहदी
कभी तो भूल गए पी के नाम तक उन का
कभी वो याद जो आए तो फिर पिया न गया
बाक़र मेहदी
मेरे सनम-कदे में कई और बुत भी हैं
इक मेरी ज़िंदगी के तुम्हीं राज़-दाँ नहीं
बाक़र मेहदी
सैलाब-ए-ज़िंदगी के सहारे बढ़े चलो
साहिल पे रहने वालों का नाम-ओ-निशाँ नहीं
बाक़र मेहदी
ये सोच कर तिरी महफ़िल से हम चले आए
कि एक बार तो बढ़ जाए हौसला दिल का
बाक़र मेहदी
ये किस जगह पे क़दम रुक गए हैं क्या कहिए
कि मंज़िलों के निशाँ तक मिटा के बैठे हैं
बाक़र मेहदी
जाने किन मुश्किलों से जीते हैं
क्या करें कोई मेहरबाँ न रहा
बाक़र मेहदी

