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बहादुर शाह ज़फ़र शायरी | शाही शायरी

बहादुर शाह ज़फ़र शेर

53 शेर

न थी हाल की जब हमें अपने ख़बर रहे देखते औरों के ऐब ओ हुनर
पड़ी अपनी बुराइयों पर जो नज़र तो निगाह में कोई बुरा न रहा

while unknowing of myself, in others faults did often see
when my own shortcomings saw, found no one else as bad as me

बहादुर शाह ज़फ़र




मर्ग ही सेहत है उस की मर्ग ही उस का इलाज
इश्क़ का बीमार क्या जाने दवा क्या चीज़ है

बहादुर शाह ज़फ़र




मैं सिसकता रह गया और मर गए फ़रहाद ओ क़ैस
क्या उन्ही दोनों के हिस्से में क़ज़ा थी मैं न था

बहादुर शाह ज़फ़र




लोगों का एहसान है मुझ पर और तिरा मैं शुक्र-गुज़ार
तीर-ए-नज़र से तुम ने मारा लाश उठाई लोगों ने

I owe people a favour and I am grateful to you
they carried my coffin when with a glance you slew

बहादुर शाह ज़फ़र




लगता नहीं है दिल मिरा उजड़े दयार में
किस की बनी है आलम-ए-ना-पाएदार में

my heart, these dismal ruins, cannot now placate
who can find sustenance in this unstable state

बहादुर शाह ज़फ़र




लड़ा कर आँख उस से हम ने दुश्मन कर लिया अपना
निगह को नाज़ को अंदाज़ को अबरू को मिज़्गाँ को

बहादुर शाह ज़फ़र




क्या ताब क्या मजाल हमारी कि बोसा लें
लब को तुम्हारे लब से मिला कर कहे बग़ैर

बहादुर शाह ज़फ़र




क्या पूछता है हम से तू ऐ शोख़ सितमगर
जो तू ने किए हम पे सितम कह नहीं सकते

बहादुर शाह ज़फ़र




कोई क्यूँ किसी का लुभाए दिल कोई क्या किसी से लगाए दिल
वो जो बेचते थे दवा-ए-दिल वो दुकान अपनी बढ़ा गए

बहादुर शाह ज़फ़र