मिरा चाक-ए-गिरेबाँ चाक-ए-दिल से मिलने वाला है
मगर ये हादसे भी बेश ओ कम होते ही रहते हैं
अज़ीज़ हामिद मदनी
शहर जिन के नाम से ज़िंदा था वो सब उठ गए
इक इशारे से तलब करता है वीराना मुझे
अज़ीज़ हामिद मदनी
सदियों में जा के बनता है आख़िर मिज़ाज-ए-दहर
'मदनी' कोई तग़य्युर-ए-आलम है बे-सबब
अज़ीज़ हामिद मदनी
नरमी हवा की मौज-ए-तरब-ख़ेज़ अभी से है
ऐ हम-सफ़ीर आतिश-ए-गुल तेज़ अभी से है
अज़ीज़ हामिद मदनी
मुबहम से एक ख़्वाब की ताबीर का है शौक़
नींदों में बादलों का सफ़र तेज़ अभी से है
अज़ीज़ हामिद मदनी
महक में ज़हर की इक लहर भी ख़्वाबीदा रहती है
ज़िदें आपस में टकराती हैं फ़र्क़-ए-मार-ओ-संदल कर
अज़ीज़ हामिद मदनी
कुछ अब के हम भी कहें उस की दास्तान-ए-विसाल
मगर वो ज़ुल्फ़-ए-परेशाँ खुले तो बात चले
अज़ीज़ हामिद मदनी
माना कि ज़िंदगी में है ज़िद का भी एक मक़ाम
तुम आदमी हो बात तो सुन लो ख़ुदा नहीं
अज़ीज़ हामिद मदनी
सुब्ह से चलते चलते आख़िर शाम हुई आवारा-ए-दिल
अब मैं किस मंज़िल में पहुँचा अब घर कितनी दूर रहा
अज़ीज़ हामिद मदनी

