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अज़हर फ़राग़ शायरी | शाही शायरी

अज़हर फ़राग़ शेर

39 शेर

मेरी नुमू है तेरे तग़ाफ़ुल से वाबस्ता
कम बारिश भी मुझ को काफ़ी हो सकती है

अज़हर फ़राग़




उस से हम पूछ थोड़ी सकते हैं
उस की मर्ज़ी जहाँ रखे जिस को

अज़हर फ़राग़




ठहरना भी मिरा जाना शुमार होने लगा
पड़े पड़े मैं पुराना शुमार होने लगा

अज़हर फ़राग़




तेज़ आँधी में ये भी काफ़ी है
पेड़ तस्वीर में बचा लिया जाए

अज़हर फ़राग़




तेरी शर्तों पे ही करना है अगर तुझ को क़ुबूल
ये सुहुलत तो मुझे सारा जहाँ देता है

अज़हर फ़राग़




मैं जानता हूँ मुझे मुझ से माँगने वाले
पराई चीज़ का जो लोग हाल करते हैं

अज़हर फ़राग़




कुछ नहीं दे रहा सुझाई हमें
इस क़दर रौशनी का क्या कीजे

अज़हर फ़राग़




महसूस कर लिया था भँवर की थकान को
यूँही तो ख़ुद को रक़्स पे माइल नहीं किया

अज़हर फ़राग़




उसे कहो जो बुलाता है गहरे पानी में
किनारे से बंधी कश्ती का मसअला समझे

अज़हर फ़राग़