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अंबरीन हसीब अंबर शायरी | शाही शायरी

अंबरीन हसीब अंबर शेर

26 शेर

तिरे फ़िराक़ में दिल का अजीब आलम है
न कुछ ख़ुमार से बढ़ कर न कुछ ख़ुमार से कम

अंबरीन हसीब अंबर




मानूस बाम-ओ-दर से नज़र पूछती रही
उन में बसे वो लोग पुराने कहाँ गए

अंबरीन हसीब अंबर




मोहब्बत और क़ुर्बानी में ही ता'मीर मुज़्मर है
दर-ओ-दीवार से बन जाए घर ऐसा नहीं होता

अंबरीन हसीब अंबर




मुझ में अब मैं नहीं रही बाक़ी
मैं ने चाहा है इस क़दर तुम को

अंबरीन हसीब अंबर




पैरवी से मुमकिन है कब रसाई मंज़िल तक
नक़्श-ए-पा मिटाने को गर्द-ए-राह काफ़ी है

अंबरीन हसीब अंबर




तअ'ल्लुक़ जो भी रक्खो सोच लेना
कि हम रिश्ता निभाना जानते हैं

अंबरीन हसीब अंबर




तश्हीर तो मक़्सूद नहीं क़िस्सा-ए-दिल की
सो तुझ को लिखा तेरी निशानी नहीं लिक्खी

अंबरीन हसीब अंबर




उम्र-भर के सज्दों से मिल नहीं सकी जन्नत
ख़ुल्द से निकलने को इक गुनाह काफ़ी है

अंबरीन हसीब अंबर




ज़िंदगी में कभी किसी को भी
मैं ने चाहा नहीं मगर तुम को

अंबरीन हसीब अंबर