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अकबर अली खान अर्शी जादह शायरी | शाही शायरी

अकबर अली खान अर्शी जादह शेर

23 शेर

वो एक लम्हा मुझे क्यूँ सता रहा है कि जो
नहीं के बा'द मगर उस की हाँ से पहले था

अकबर अली खान अर्शी जादह




सर-ए-ख़ार से सर-ए-संग से जो है मेरा जिस्म लहू लहू
कभी तू भी तो मिरे संग-ए-मील कभी रंग मेरे सफ़र के देख

अकबर अली खान अर्शी जादह




सुराही-ए-मय-ए-नाब-ओ-सफीना-हा-ए-ग़ज़ल
ये हर्फ़-ए-हुस्न-ए-मुक़द्दर लिखा है किस के लिए

अकबर अली खान अर्शी जादह




तुम्हें नहीं हो अगर आज गोश-बर-आवाज़
ये मेरी फ़िक्र ये मेरी नवा है किस के लिए

अकबर अली खान अर्शी जादह




वही गुमाँ है जो उस मेहरबाँ से पहले था
वहीं से फिर ये सफ़र है जहाँ से पहले था

अकबर अली खान अर्शी जादह




वही मायूसी का आलम वही नौमीदी का रंग
ज़िंदगी भी किसी मुफ़्लिस की दुआ हो जैसे

अकबर अली खान अर्शी जादह




ये इक सवाल है शिकवा नहीं गिला भी नहीं
मिरे ख़ुदा तिरा लुत्फ़-ओ-अता है किस के लिए

अकबर अली खान अर्शी जादह




ज़ब्त-ए-जुनूँ से अंदाज़ों पर दर तो बंद नहीं होते
तू मुझ से बढ़ कर रुस्वा हो ये भी तो हो सकता है

अकबर अली खान अर्शी जादह




ये पड़ी हैं सदियों से किस लिए तिरे मेरे बीच जुदाइयाँ
कभी अपने घर तू मुझे बुला कभी रास्ते मिरे घर के देख

अकबर अली खान अर्शी जादह