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आनिस मुईन शायरी | शाही शायरी

आनिस मुईन शेर

30 शेर

था इंतिज़ार मनाएँगे मिल के दीवाली
न तुम ही लौट के आए न वक़्त-ए-शाम हुआ

आनिस मुईन




कब बार-ए-तबस्सुम मिरे होंटों से उठेगा
ये बोझ भी लगता है उठाएगा कोई और

आनिस मुईन




क्यूँ खुल गए लोगों पे मिरी ज़ात के असरार
ऐ काश कि होती मिरी गहराई ज़रा और

आनिस मुईन




मैं अपनी ज़ात की तन्हाई में मुक़य्यद था
फिर इस चटान में इक फूल ने शिगाफ़ किया

आनिस मुईन




मेरे अपने अंदर एक भँवर था जिस में
मेरा सब कुछ साथ ही मेरे डूब गया है

आनिस मुईन




मुमकिन है कि सदियों भी नज़र आए न सूरज
इस बार अंधेरा मिरे अंदर से उठा है

आनिस मुईन




न जाने बाहर भी कितने आसेब मुंतज़िर हों
अभी मैं अंदर के आदमी से डरा हुआ हूँ

आनिस मुईन




न थी ज़मीन में वुसअत मिरी नज़र जैसी
बदन थका भी नहीं और सफ़र तमाम हुआ

आनिस मुईन




ये और बात कि रंग-ए-बहार कम होगा
नई रुतों में दरख़्तों का बार कम होगा

आनिस मुईन