कोई दुख मिटाता नहीं
शब्द की चोट
कौन सहलाए
मेरे मन में
शब्द की चोट लगी है
चोट रिसती है
दुख पलता है
अपनों से भी
अपना लगता है
ख़्वाब भी रिसने से पहले
पलते हैं
तुम ने
बिन देखा ख़्वाब पाल के
काएनात बनाई
तुम्हारी काएनात के घाव की
कितनी मसाफ़त में
दुख रौशन हो जाएँगे
तुम्हारी काएनात के
किस कोने में
दुख सुन हो जाएँगे
नज़्म
तेरी दुनिया में
शबनम अशाई

