आज जिस तनाज़ुर में
काएनात को देखा
हर तरह मुकम्मल थी
पहले इतनी शिद्दत से
कब ख़याल आया था
इस क़दर अकेला हूँ
नज़्म
तज्ज़िया
शहराम सर्मदी
नज़्म
शहराम सर्मदी
आज जिस तनाज़ुर में
काएनात को देखा
हर तरह मुकम्मल थी
पहले इतनी शिद्दत से
कब ख़याल आया था
इस क़दर अकेला हूँ