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शिकस्त | शाही शायरी
shikast

नज़्म

शिकस्त

शहराम सर्मदी

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मुझे अपने बैरून की जुस्तुजू थी
कि वो आँख से अपनी देखा था मैं ने

जज़ाइर
वो सब रेख़्ता ना-रसीदा जज़ाइर

ख़लाओं में बिखरे गिरे
ज़ीस्त-आसार के शाएबे जिन में थे

अब मिरी जुस्तुजू या हवस का
हदफ़ बन गए थे

मैं उन की तमन्ना लिए
दिलकश ओ मस्त राहों में

इक उम्र घूमा किया
माह-ओ-अंजुम को चूमा क्या

और कल शाम
बअ'द-अज़-सफ़र

बा-हज़ाराँ ज़फ़र
अपने बैरून की दस्तयाबी के

जश्न-ए-तरब में
मैं जब शादमाँ था

यकायक निगह
अंदरूँ की तरफ़ मुड़ गई

इक शिकस्त-ए-अजब ज़ात से जुड़ गई