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नज़्म | शाही शायरी
nazm

नज़्म

नज़्म

शबनम अशाई

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काश यूँ होता
कि वफ़ा

मन का फ़िरन चाक कर के
फ़रार पाती!

बख़िये उधेड़ कर
ऊधम जोत के

मन को छोड़ जाती
इंतिज़ार तमाम

कट जाते
मन की आँख लग जाती!