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नज़्म | शाही शायरी
nazm

नज़्म

नज़्म

शबनम अशाई

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मेरी लुक्नत
उस क़लम की ज़बान है

जिस को
तुम्हारी अना ने तराशा

और ये जो गूँज है
मेरे वजूद के

टूटने की आवाज़ है
कोई फ़ेमीनिज़म नहीं

बस
बे-हैसियती है