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नए अहद का नया सवाल | शाही शायरी
nae ahd ka naya sawal

नज़्म

नए अहद का नया सवाल

शहरयार

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ये बात रोज़-ए-अज़ल से तय है
ज़मीन जिस्मों का बोझ उठाएगी

आसमाँ पर रहेंगी रूहें
मगर कोई है जो ये बताए

हमारी परछाइयों की क़ब्रें
कहाँ बनेंगी?