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मुझे हँसना पड़ा आख़िर | शाही शायरी
mujhe hansna paDa aaKHir

नज़्म

मुझे हँसना पड़ा आख़िर

शारिक़ कैफ़ी

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मुझे हँसना पड़ा आख़िर
उन्हीं बातों पे

जिन पर मैं बहुत नाराज़ था उस से
ये इक-तरफ़ा मोहब्बत

यूँ भी इतना दर्द देती है
कि इस में बीच का रस्ता कभी मुमकिन नहीं होता

वही झुकता है
जिस को दूसरा दरकार होता है

किसी क़ीमत पे चाहे जो भी हो जाए