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मोहब्बत की इंतिहा पर | शाही शायरी
mohabbat ki intiha par

नज़्म

मोहब्बत की इंतिहा पर

शारिक़ कैफ़ी

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पापा
तुम मर जाओ न पापा

मैं तुम से नफ़रत करता हूँ
कश तुम लेते हो खाँसी मुझ को आती है

दिल के दौरे तुम्हें नहीं
मुझ को पड़ते हैं

आख़िर कब तक
रात में उठ कर

लाइट जला कर
देखूँगा मैं साँस तुम्हारी

कब तक मेरी टीचर
मुझ को टोकेगी

गुम-सुम रहने पर
कैसे बतलाऊँ

मैं कितना डर जाता हूँ
जब मेरी रिक्शा मुड़ती है

घर वाले रस्ते पर
आज भी कम बेचैन नहीं मैं

मोड़ वो बस आने वाला है
चैन पड़ गया

आज भी मेरे घर के आगे भीड़ नहीं है
यानी

आज भी शायद सब कुछ ठीक है घर में
यानी तुम ज़िंदा हो पापा