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मैं वापस आऊँगा | शाही शायरी
main wapas aaunga

नज़्म

मैं वापस आऊँगा

शहराम सर्मदी

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ग़ार-ए-हरा-ए-शायरी में
बैठने जाता हूँ मैं

और मैं हिसार-ए-ज़ात भी कर के रखूँगा
इस हिसार-ए-ज़ात के बाहर

कोई भी दाश्ता शोहरत की
शहर-नौ लगा बैठे न अपना

देखते रहना
न करना इंतिज़ार इस का

कि मैं ताज़ा सहीफ़ा लाने वाला हूँ
कि हर ताज़ा सहीफ़ा

एक दिन मंसूख़ होना है
उसे वो मअनी-ओ-मफ़्हूम खोना है

जो असल मुद्दआ है
मैं वापस आऊँगा

और मैं 'किताब-ए-ज़ात' इक हम-राह लाऊँगा
'किताब-ए-ज़ात' की हर आयत

इंसानी मसाइल का बयाँ होगी
तलाश-ए-हल के मारों की

उमीदों का ज़ियाँ होगी
मसाइल जावेदाँ हैं

ज़ात का असल-ए-बयाँ हैं
और फ़रार उन से बला है

और यही रम्ज़-ए-तलाश-ए-'आँ-ख़ुदा' है
और तलाश-ए-'आँ-ख़ुदा' आईना-हा-ए-ज़िंदगी

और ज़िंदगी ग़ार-ए-हिरा है ज़ात-ए-इन्सां की
इसी ग़ार-ए-हिरा में जब

मयस्सर ज़ात आएगी
मैं वापस आऊँगा

और मैं 'किताब-ए-ज़ात' इक हम-राह लाऊँगा
कोई भी दाश्ता शोहरत की

शहर-ए-नौ लगा बैठे न अपना
देखते रहना