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मुज़्महिल होने पे भी ख़ुद को जवाँ रखते हैं हम | शाही शायरी
muzmahil hone pe bhi KHud ko jawan rakhte hain hum

ग़ज़ल

मुज़्महिल होने पे भी ख़ुद को जवाँ रखते हैं हम

ज़हीर काश्मीरी

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मुज़्महिल होने पे भी ख़ुद को जवाँ रखते हैं हम
एक सर है जिस पे सातों आसमाँ रखते हैं हम

हम गरेबाँ-चाक लोगों को तही-दामन न जान
ले क़िमार-ए-आशिक़ी में नक़्द-ए-जाँ रखते हैं हम

कोई तो आख़िर चला आएगा पुर्सिश के लिए
तू न आएगा तो मर्ग-ए-ना-गहाँ रखते हैं हम

एहतिराम-ए-ग़म से हैं सूखे जज़ीरों की तरह
वर्ना इन आँखों में बहर-ए-बे-कराँ रखते हैं हम

इश्क़ में ज़ौक़-ए-तकल्लुम है हलाकत-आफ़रीं
आरज़ू भी एहतियातन बे-ज़बाँ रखते हैं हम

मह-वशों के आरिज़ों में देखते हैं अपना अक्स
अल्लाह अल्लाह अपना साया भी कहाँ रखते हैं हम

लाख हों फैली हुई मंज़िल-ब-मंज़िल ज़ुल्मतें
साथ अपने मशअ'ल-ए-हुस्न-ए-बुताँ रखते हैं हम