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मुरादें कोई पाता है किसी की जान जाती है | शाही शायरी
muraden koi pata hai kisi ki jaan jati hai

ग़ज़ल

मुरादें कोई पाता है किसी की जान जाती है

ज़हीर देहलवी

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मुरादें कोई पाता है किसी की जान जाती है
हज़ारों देखने वाले तिरी चितवन के बैठे हैं

अदू आशिक़ सही माना उसी पर मुनहसिर क्या है
अभी तो चाहने वाले बहुत बचपन के बैठे हैं

सबा क्या ख़ाक उड़ाएगी अदू क्या क़हर ढाएँगे
वो ख़ुद पामाल करने को मिरे मदफ़न के बैठे हैं

सुराग़-ए-नक़्श-ए-पा-ए-ग़ैर शायद अपना रहबर हो
सर-ए-राह-ए-तलब हम मुंतज़िर रहज़न के बैठे हैं