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मरना अज़ाब था कभी जीना अज़ाब था | शाही शायरी
marna azab tha kabhi jina azab tha

ग़ज़ल

मरना अज़ाब था कभी जीना अज़ाब था

ज़हीर काश्मीरी

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मरना अज़ाब था कभी जीना अज़ाब था
मेरा मुशीर इश्क़ सा ख़ाना-ख़राब था

वो बारगाह मेरी वफ़ा का जवाज़ थी
उस आस्ताँ की ख़ाक मिरा ही शबाब था

दिल भी सनम-परस्त नज़र भी सनम-परस्त
इस आशिक़ी में ख़ाना हमा-आफ़्ताब था

तू कब मआल-ए-जौर-ओ-जफ़ा को समझ सका
तेरा जमाल तेरे लिए भी हिजाब था

वो हुस्न किस क़दर अदब-आमोज़ था 'ज़हीर'
क़द ख़ामा-ए-रवाँ था तो चेहरा किताब था