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जो वो मिरे न रहे मैं भी कब किसी का रहा | शाही शायरी
jo wo mere na rahe main bhi kab kisi ka raha

ग़ज़ल

जो वो मिरे न रहे मैं भी कब किसी का रहा

कैफ़ी आज़मी

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जो वो मिरे न रहे मैं भी कब किसी का रहा
बिछड़ के उन से सलीक़ा न ज़िंदगी का रहा

लबों से उड़ गया जुगनू की तरह नाम उस का
सहारा अब मिरे घर में न रौशनी का रहा

गुज़रने को तो हज़ारों ही क़ाफ़िले गुज़रे
ज़मीं पे नक़्श-ए-क़दम बस किसी किसी का रहा