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इक इक क़दम फ़रेब-ए-तमन्ना से बच के चल | शाही शायरी
ek ik qadam fareb-e-tamanna se bach ke chal

ग़ज़ल

इक इक क़दम फ़रेब-ए-तमन्ना से बच के चल

शकील बदायुनी

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इक इक क़दम फ़रेब-ए-तमन्ना से बच के चल
दुनिया की आरज़ू है तो दुनिया से बच के चल

ख़ुद ढूँढ लेगा तुझ को तिरा मुनफ़रिद मक़ाम
राह-ए-तलब में नक़्श-ए-कफ़-ए-पा से बच के चल

बाक़ी है मेरे दिल में अभी अज़्मत-ए-वजूद
क़तरे से कह रहा हूँ कि दरिया से बच के चल

मिलती नहीं है राह-ए-सुकूँ ख़ौफ़-ओ-यास में
गुलशन की जुस्तुजू है तो सहरा से बच के चल

मुँह जादा-ए-वफ़ा से न मोड़ ऐ वफ़ा-शिआर
लेकिन हुदूद-ए-चश्म-ए-तमाशा से बच के चल

कितनी हसीं हैं उन के सितम की मसर्रतें
शुक्र-ए-करम की ज़हमत-ए-बे-जा से बच के चल

लम्हे उदास उदास फ़ज़ाएँ घुटी घुटी
दुनिया अगर यही है तो दुनिया से बच के चल

अपने अदब पे नाज़ है तुझ को अगर 'शकील'
मग़रिब-ज़दा अदीब की दुनिया से बच के चल