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हमें सलीक़ा न आया जहाँ में जीने का | शाही शायरी
hamein saliqa na aaya jahan mein jine ka

ग़ज़ल

हमें सलीक़ा न आया जहाँ में जीने का

फ़ारिग़ बुख़ारी

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हमें सलीक़ा न आया जहाँ में जीने का
कभी किया न कोई काम भी क़रीने का

तुम्हारे साथ ही उस को भी डूब जाना है
ये जानता है मुसाफ़िर तिरे सफ़ीने का

कुछ उस का साथ निभाना मुहाल था यूँ भी
हमारा अपना था अंदाज़ एक जीने का

सख़ावतों ने गोहर-साज़ कर दिया है उन्हें
कोई सदफ़ नहीं मोहताज आबगीने का