मोहकमे में इश्क़ के है यारो दीवाने का शोर
मेरे दिल देने का ग़ुल उस के मुकर जाने का शोर
वली उज़लत
मैं सहरा जा के क़ब्र-ए-हज़रत-ए-मजनूँ को देखा था
ज़ियारत करते थे आहू बगूला तौफ़ करता था
वली उज़लत
कुछ ग़ौर का जौहर नहीं ख़ुद-फ़हमी में हैराँ हैं
इस अस्र के फ़ाज़िल सब सतही हैं जूँ आईना
वली उज़लत
कहा जो मैं ने गया ख़त से हाए तेरा हुस्न
तो हँस के मुझ को कहा पश्म से गया तो गया
वली उज़लत
जो हम ये तिफ़लों के संग-ए-जफ़ा के मारे हैं
बुतों का शिकवा नहीं हम ख़ुदा के मारे हैं
वली उज़लत
ऐ सालिक इंतिज़ार-ए-हज में क्या तू हक्का-बक्का है
बगूले सा तो कर ले तौफ़ दिल पहलू में मक्का है
वली उज़लत
जिस पर नज़र पड़े उसे ख़ुद से निकालना
रौशन-दिलों का काम है मानिंद-ए-आईना
वली उज़लत
जपे है विर्द सा तुझ से सनम के नाम को शैख़
नमाज़ तोड़ उठे तेरे राम राम को शैख़
वली उज़लत
जल्द मर गए तिरी हसरत सेती हम
कि तिरा देर का आना न गया
वली उज़लत

