है ये पुर-दर्द दास्ताँ 'महरूम'
क्या सुनाएँ किसी को हाल अपना
तिलोकचंद महरूम
यूँ तो बरसों न पिलाऊँ न पियूँ ऐ ज़ाहिद
तौबा करते ही बदल जाती है नीयत मेरी
तिलोकचंद महरूम
ये फ़ितरत का तक़ाज़ा था कि चाहा ख़ूब-रूओं को
जो करते आए हैं इंसाँ न करते हम तो क्या करते
तिलोकचंद महरूम
उठाने के क़ाबिल हैं सब नाज़ तेरे
मगर हम कहाँ नाज़ उठाने के क़ाबिल
तिलोकचंद महरूम
तलातुम आरज़ू में है न तूफ़ाँ जुस्तुजू में है
जवानी का गुज़र जाना है दरिया का उतर जाना
तिलोकचंद महरूम
साफ़ आता है नज़र अंजाम हर आग़ाज़ का
ज़िंदगानी मौत की तम्हीद है मेरे लिए
तिलोकचंद महरूम
न रही बे-ख़ुदी-ए-शौक़ में इतनी भी ख़बर
हिज्र अच्छा है कि 'महरूम' विसाल अच्छा है
तिलोकचंद महरूम
न इल्म है न ज़बाँ है तो किस लिए 'महरूम'
तुम अपने आप को शाइर ख़याल कर बैठे
तिलोकचंद महरूम
मंदिर भी साफ़ हम ने किए मस्जिदें भी पाक
मुश्किल ये है कि दिल की सफ़ाई न हो सकी
तिलोकचंद महरूम

