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सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम शायरी | शाही शायरी

सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम शेर

44 शेर

क्या खाएँ हम वफ़ा में अब ईमान की क़सम
जब तार-ए-सुब्हा रिश्ता-ए-ज़ुन्नार हो चुका

सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम




फूँक दो याँ गर ख़स-ओ-ख़ाशाक हैं
दूर क्यूँ फेंको हमें गुलज़ार से

सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम




'नाज़िम' ये इंतिज़ाम रिआ'यत है नाम की
मैं मुब्तला नहीं हवस-ए-मुल्क-ओ-माल का

सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम




न बज़ला-संज न शाएर न शोख़-तब्अ रक़ीब
दिया है आप ने ख़ल्वत में अपनी बार किसे

सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम




मुहताज नहीं क़ाफ़िला आवाज़-ए-दरा का
सीधी है रह-ए-बुत-कदा एहसान ख़ुदा का

सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम




क्या मेरे काम से है रवाई को दुश्मनी
कश्ती मिरी खुली थी कि दरिया ठहर गया

सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम




ख़रीदारी है शहद ओ शीर ओ क़स्र ओ हूर ओ ग़िल्माँ की
ग़म-ए-दीं भी अगर समझो तो इक धंदा है दुनिया का

सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम




कहते हो सब कि तुझ से ख़फ़ा हो गया है यार
ये भी कोई बताओ कि किस बता पर हुआ

सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम




कम समझते नहीं हम ख़ुल्द से मयख़ाने को
दीदा-ए-हूर कहा चाहिए पैमाने को

सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम