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शरफ़ मुजद्दिदी शायरी | शाही शायरी

शरफ़ मुजद्दिदी शेर

22 शेर

शैख़ कुछ अपने-आप को समझें
मय-कशों की नज़र में कुछ भी नहीं

शरफ़ मुजद्दिदी




जिस को चाहा तू ने उस को मिल गया
वर्ना तुझ को पाने वाला कौन था

शरफ़ मुजद्दिदी




कम-सिनी जिन की हमें याद है और कल की ही बात
आज उन्हें देखिए क्या हो गए क्या से बढ़ कर

शरफ़ मुजद्दिदी




पामालियों का ज़ीना है अर्श से भी ऊँचा
दिल उस की राह में है क्या सरफ़राज़ मेरा

शरफ़ मुजद्दिदी




पारसा बन के सू-ए-मय-ख़ाना
सर झुकाए हुए हम जाते हैं

शरफ़ मुजद्दिदी




क़दमों पे गिरा तो हट के बोले
अंधा है तो देखता नहीं है

शरफ़ मुजद्दिदी




तसव्वुर ने तिरे आबाद जब से घर किया मेरा
निकलता ही नहीं दिन रात अपने घर में रहता है

शरफ़ मुजद्दिदी




उश्शाक़ के आगे न लड़ा ग़ैरों से आँखें
डर है कि न हो जाए लड़ाई तिरे दर पर

शरफ़ मुजद्दिदी




तेरी आँखें जिसे चाहें उसे अपना कर लें
काश ऐसा ही सिखा दें कोई अफ़्सूँ मुझ को

शरफ़ मुजद्दिदी