तमाम बिछड़े हुओं को मिलाओ आज की रात
तमाम खोए हुओं को इशारा कर के लाओ
सालिम सलीम
क्या हो गया कि बैठ गई ख़ाक भी मिरी
क्या बात है कि अपने ही ऊपर खड़ा हूँ मैं
सालिम सलीम
मैं आप अपने अंधेरों में बैठ जाता हूँ
फिर इस के बाद कोई शय चमकती रहती है
सालिम सलीम
मैं घटता जा रहा हूँ अपने अंदर
तुम्हें इतना ज़ियादा कर लिया है
सालिम सलीम
मेरी मिट्टी में कोई आग सी लग जाती है
जो भड़कती है तिरे छिड़के हुए पानी से
सालिम सलीम
न जाने कैसी गिरानी उठाए फिरता हूँ
न जाने क्या मिरे काँधे पे सर सा रहता है
सालिम सलीम
वो दूर था तो बहुत हसरतें थीं पाने की
वो मिल गया है तो जी चाहता है खोने को
सालिम सलीम
ज़िंदगी ने जो कहीं का नहीं रक्खा मुझ को
अब मुझे ज़िद है कि बर्बाद किया जाए उसे
सालिम सलीम
ये कैसी आग है मुझ में कि एक मुद्दत से
तमाशा देख रहा हूँ मैं अपने जलने का
सालिम सलीम

