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साहिर देहल्वी शायरी | शाही शायरी

साहिर देहल्वी शेर

23 शेर

मिल-मिला के दोनों ने दिल को कर दिया बरबाद
हुस्न ने किया बे-ख़ुद इश्क़ ने किया आज़ाद

साहिर देहल्वी




मैं दीवाना हूँ और दैर-ओ-हरम से मुझ को वहशत है
पड़ी रहने दो मेरे पाँव में ज़ंजीर-ए-मय-ख़ाना

साहिर देहल्वी




क्या शौक़ का आलम था कि हाथों से उड़ा ख़त
दिल थाम के उस शोख़ को लिखने जो लगा ख़त

साहिर देहल्वी




आते हुए इस तन में न जाते हुए तन से
है जान-ए-मकीं को न लगावट न रुकावट

साहिर देहल्वी




कौनैन-ए-ऐन-ए-इल्म में है जल्वा-गाह-ए-हुस्न
जेब-ए-ख़िरद से ऐनक-ए-इरफ़ाँ निकालिए

साहिर देहल्वी




जो ला-मज़हब हो उस को मिल्लत-ओ-मशरब से क्या मतलब
मिरा मशरब है रिंदी रिंद को मज़हब से क्या मतलब

साहिर देहल्वी




हम गदा-ए-दर-ए-मय-ख़ाना हैं ऐ पीर-ए-मुग़ाँ
काम अपना तिरे सदक़े में चला लेते हैं

साहिर देहल्वी




है सनम-ख़ाना मिरा पैमान-ए-इश्क़
ज़ौक़-ए-मय-ख़ाना मुझे सामान-ए-इश्क़

साहिर देहल्वी




ग़म-ए-मौजूद ग़लत और ग़म-ए-फ़र्दा बातिल
राहत इक ख़्वाब है जिस की कोई ताबीर नहीं

साहिर देहल्वी