ख़्वाब क्या था जो मिरे सर में रहा
रात भर इक शोर सा घर में रहा
नज़ीर क़ैसर
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यूँ तुझे देख के चौंक उठती हैं सोई यादें
जैसे सन्नाटे में आवाज़ लगा दे कोई
नज़ीर क़ैसर
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उस ने ख़त में भेजे हैं
भीगी रात और भीगा दिन
नज़ीर क़ैसर
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उभर रहे हैं कई हाथ शब के पर्दे से
कोई सितारा लिए कोई माहताब लिए
नज़ीर क़ैसर
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रंग लाई है हसरत-ए-तामीर
गिर रही हैं इमारतें क्या क्या
नज़ीर क़ैसर
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पत्थर होता जाता हूँ
हँसने दो या रोने दो
नज़ीर क़ैसर
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नया लिबास पहन कर भी
दुनिया वही पुरानी है
नज़ीर क़ैसर
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मैं उसे कैसे जीत सकता हूँ
वो मुझे अपना जिस्म हारती है
नज़ीर क़ैसर
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कोई मुझ को ढूँढने वाला
भूल गया है रस्ता मुझ में
नज़ीर क़ैसर
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