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मंज़र भोपाली शायरी | शाही शायरी

मंज़र भोपाली शेर

18 शेर

इन आँसुओं का कोई क़द्र-दान मिल जाए
कि हम भी 'मीर' का दीवान ले के आए हैं

मंज़र भोपाली




ये किरदारों के गंदे आइने अपने ही घर रखिए
यहाँ पर कौन कितना पारसा है हम समझते हैं

मंज़र भोपाली




ये अश्क तेरे मिरे राएगाँ न जाएँगे
उन्हीं चराग़ों से रौशन मोहब्बतें होंगी

मंज़र भोपाली




उन्हीं पे सारे मसाइब का बोझ रक्खा है
जो तेरे शहर में ईमान ले के आए हैं

मंज़र भोपाली




सफ़र के बीच ये कैसा बदल गया मौसम
कि फिर किसी ने किसी की तरफ़ नहीं देखा

मंज़र भोपाली




कोई तख़्लीक़ हो ख़ून-ए-जिगर से जन्म लेती है
कहानी लिख नहीं सकते कहानी माँगने वाले

मंज़र भोपाली




ख़ुद को पोशीदा न रक्खो बंद कलियों की तरह
फूल कहते हैं तुम्हें सब लोग तो महका करो

मंज़र भोपाली




कमानों में खिंचे हैं तीर तलवारें हैं चमकी
ज़रा ठहरो कहाँ जाते हो दरिया देखने को

मंज़र भोपाली




जो पारसा हो तो क्यूँ इम्तिहाँ से डरते हो
हम ए'तिबार का मीज़ान ले के आए हैं

मंज़र भोपाली