EN اردو
मलिकज़ादा मंज़ूर अहमद शायरी | शाही शायरी

मलिकज़ादा मंज़ूर अहमद शेर

23 शेर

कुछ ग़म-ए-जानाँ कुछ ग़म-ए-दौराँ दोनों मेरी ज़ात के नाम
एक ग़ज़ल मंसूब है उस से एक ग़ज़ल हालात के नाम

मलिकज़ादा मंज़ूर अहमद




ख़्वाब का रिश्ता हक़ीक़त से न जोड़ा जाए
आईना है इसे पत्थर से न तोड़ा जाए

मलिकज़ादा मंज़ूर अहमद




खिल उठे गुल या खिले दस्त-ए-हिनाई तेरे
हर तरफ़ तू है तो फिर तेरा पता किस से करें

मलिकज़ादा मंज़ूर अहमद




अब देख के अपनी सूरत को इक चोट सी दिल पर लगती है
गुज़रे हुए लम्हे कहते हैं आईना भी पत्थर होता है

मलिकज़ादा मंज़ूर अहमद




जिन सफ़ीनों ने कभी तोड़ा था मौजों का ग़ुरूर
उस जगह डूबे जहाँ दरिया में तुग़्यानी न थी

मलिकज़ादा मंज़ूर अहमद




हाल-ए-परेशाँ सुन कर मेरा आँख में उस की आँसू हैं
मैं ने उस से झूट कहा हो ऐसा भी हो सकता है

मलिकज़ादा मंज़ूर अहमद




दीवाना हर इक हाल में दीवाना रहेगा
फ़रज़ाना कहा जाए कि दीवाना कहा जाए

मलिकज़ादा मंज़ूर अहमद




देखोगे तो हर मोड़ पे मिल जाएँगी लाशें
ढूँडोगे तो इस शहर में क़ातिल न मिलेगा

मलिकज़ादा मंज़ूर अहमद




दौर-ए-इशरत ने सँवारे हैं ग़ज़ल के गेसू
फ़िक्र के पहलू मगर ग़म की बदौलत आए

मलिकज़ादा मंज़ूर अहमद