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महफूजुर्रहमान आदिल शायरी | शाही शायरी

महफूजुर्रहमान आदिल शेर

36 शेर

मेरे तलवों के लहू से होगी रौशन हर जिहत
रह-रवान-राह-ए-मंज़िल होंगे शश्दर देखना

महफूजुर्रहमान आदिल




उन सफ़ीनों की तबाही में है इबरत का सबक़
जो किनारे तक पहुँच कर नज़्र-ए-तूफ़ाँ हो गए

महफूजुर्रहमान आदिल




उसी ने बख़्शा है मुझ को शुऊ'र जीने का
जो मुश्किलों की घड़ी बार बार आई है

महफूजुर्रहमान आदिल




वक़्त की गर्दिशों का ग़म न करो
हौसले मुश्किलों में पलते हैं

महफूजुर्रहमान आदिल




वो जगा कर हम को सब ख़ुश-मंज़री ले जाएगा
ख़्वाब क्या है ख़्वाब की ताबीर भी ले जाएगा

महफूजुर्रहमान आदिल




वो लाला-बदन झील में उतरा नहीं वर्ना
शो'ले मुतवातिर इसी पानी से निकलते

महफूजुर्रहमान आदिल




वो मिरी आवारागर्दी वो मिरा दीवाना-पन
वो मिरी तअ'ज़ीम में दीवार-ओ-दर का जागना

महफूजुर्रहमान आदिल




ये भी है मारा हुआ साक़ी की चश्म-ए-नाज़ का
इस लिए 'आदिल' को शीशे की परी अच्छी लगी

महफूजुर्रहमान आदिल




ज़िंदगी को हौसला देने के ख़ातिर
ख़्वाहिशों को रेज़ा रेज़ा चुन रहा हूँ

महफूजुर्रहमान आदिल