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महबूब ख़िज़ां शायरी | शाही शायरी

महबूब ख़िज़ां शेर

26 शेर

ये दिल-नवाज़ उदासी भरी भरी पलकें
अरे इन आँखों में क्या है सुनो दिखाओ मुझे

महबूब ख़िज़ां




कोई रस्ता कहीं जाए तो जानें
बदलने के लिए रस्ते बहुत हैं

महबूब ख़िज़ां




मिरी निगाह में कुछ और ढूँडने वाले
तिरी निगाह में कुछ और ढूँडता हूँ मैं

महबूब ख़िज़ां




पलट गईं जो निगाहें उन्हीं से शिकवा था
सो आज भी है मगर देर हो गई शायद

महबूब ख़िज़ां




तुम्हारे वास्ते सब कुछ है मेरे बंदा-नवाज़
मगर ये शर्त कि पहले पसंद आओ मुझे

महबूब ख़िज़ां




तुम्हें ख़याल नहीं किस तरह बताएँ तुम्हें
कि साँस चलती है लेकिन उदास चलती है

महबूब ख़िज़ां




उलझते रहने में कुछ भी नहीं थकन के सिवा
बहुत हक़ीर हैं हम तुम बड़ी है ये दुनिया

महबूब ख़िज़ां




ये लोग साँस भी लेते हैं ज़िंदा भी हैं मगर
हर आन जैसे इन्हें रोकती है ये दुनिया

महबूब ख़िज़ां




ज़ख़्म बिगड़े तो बदन काट के फेंक
वर्ना काँटा भी मोहब्बत से निकाल

महबूब ख़िज़ां