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जोश मलसियानी शायरी | शाही शायरी

जोश मलसियानी शेर

20 शेर

सोज़-ए-ग़म ही से मिरी आँख में आँसू आए
सोचता हूँ कि इसे आग कहूँ या पानी

जोश मलसियानी




मक़्बूल हों न हों ये मुक़द्दर की बात है
सज्दे किसी के दर पे किए जा रहा हूँ मैं

whether or not accepted, it is up to fate
at her doorstep on and on, I myself prostrate

जोश मलसियानी




मोहब्बत कहाँ ये तो बेचारगी है सितम भी सहें फिर करम इस को समझें
ये जब्र इस लिए कर लिया है गवारा कि इस के सिवा कोई चारा न देखा

जोश मलसियानी




नक़्श-ए-उल्फ़त मिट गया तो दाग़-ए-उल्फ़त हैं बहुत
शुक्र कर ऐ दिल कि तेरे घर की दौलत घर में है

जोश मलसियानी




पी लोगे तो ऐ शैख़ ज़रा गर्म रहोगे
ठंडा ही न कर दें कहीं जन्नत की हवाएँ

जोश मलसियानी




वही मरने की तमन्ना वही जीने की हवस
न जफ़ाएँ तुम्हें आईं न वफ़ाएँ आईं

जोश मलसियानी




ये अदा हुई कि जफ़ा हुई ये करम हुआ कि सज़ा हुई
उसे शौक़-ए-दीद अता किया जो निगह की ताब न ला सके

is this grace or torment, a favour or a punishment
Lust for sight he has got, but no vision to present

जोश मलसियानी




या रहें इस में अपने घर की तरह
या मिरे दिल में आप घर न करें

जोश मलसियानी




किस तरह दूर हों आलाम-ए-ग़रीब-उल-वतनी
ज़िंदगी ख़ुद भी ग़रीब-उल-वतनी होती है

जोश मलसियानी